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इसी दरवाज़े से एक दिन उसको आना था,
मैं टकटकी लगाये देखता रहा,
इंतज़ार आसान रहा,
मैं मुश्किल होता गया,
चौखट को छूने वाली हवा,
अपनी आहट यहाँ छोड़ कर चली गयी,
दुबारा कभी ना आने को,
गुज़रते वक़्त के साथ,
ये दरवाज़ा मेरे अंदर के दीमक को खाने लगा,
मेरी भावनाओं ने छोड़ दिया,
दरवाज़े की तरफ देखना,
मगर मैं निरंतर इस दरवाज़े को देखता रहा,
एक दिन, मैं भी काठ का दरवाजा हो गया,
उसी काठ के दरवाजे से,
एक दिन मौत आयी,
मेरा दरवाज़ा हो जाना,
मेरी नियति थी,
उसका मेरी मौत बन जाना,
उसकी नियति थी,
नियति की नियति यही है,
वो कभी दरवाज़े से नहीं आती,
दरवाज़े की नियति है,
कि उससे कुछ नहीं आता,
उससे बस टूटी हुई उम्मीद,
बाहर जाती है।
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Writing ✍️ By : Saurav Meena ( Nicki - Hazel )
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