Thursday, 23 December 2021

"You Don't Lie To The Doctor. If You Do , You Die."

She asked me, "What has been your biggest fear throughout your life?" I sat there. Quietly. Normally, your silence hits others, but today I was hit by my own silence. 

Like I do have a lot of phobias. But fear? I don't know. Do I fear anything? Losing people? Losing things? Losing myself? Anything? I might have a lot of answers to these questions, but today I did't have one. 

I pretended to think and told her that I fear dying on a hospital bed. She had another question ready, "why?" "I don't want to experience that helplessness", 

I said. In that moment, I felt helpless of that fact that I don't have a fear. I felt more helpless about telling a lie to prove that everything is normal. Nothing is normal on a deathbed. Or may be, everything is. Death is normal at any age, but the way you die is not. Or may be, it is. That's like too many abnormalities to figure out in very less time. I closed my eyes to give them some relief. She looked at me in sympathy. 

She left the room. My soul started leaving me. I felt helpless again. While leaving, my soul just whispered in my ear, "you don't lie to the doctor. If you do, you die." 

Your soul knows everything. My soul knew my biggest fear. It was, "if she leaves, l'll die." 

She wasn't my love. She was my hope. Sometimes, hope is more important than love. To live, and to survive. And sometimes, just to stay alive.




उसने मुझसे पूछा, "आपके पूरे जीवन में आपका सबसे बड़ा डर क्या रहा है?"  मैं वहीं बैठ गया , चुपचाप ! आम तौर पर मेरी खामोशी दूसरों को चुभती है, पर आज खुद की खामोशी से मुझ पर ज़ुल्म हुआ !  

जैसे मुझे बहुत सारे फोबिया हैं।  लेकिन डर ? मुझे नहीं पता।  क्या मुझे किसी बात का डर है ?  लोगों को खोना?  चीजें खोना ? खुद को खोना ? कुछ भी ?  मेरे पास इन सवालों के बहुत सारे जवाब हो सकते हैं, लेकिन आज मेरे पास एक नहीं था।  

मैंने सोचने का नाटक किया और उससे कहा कि मुझे अस्पताल के बिस्तर पर मरने का डर है।  उसके पास एक और सवाल तैयार था, "क्यों?"  "मैं उस लाचारी का अनुभव नहीं करना चाहता", 

मैंने कहा।  उस पल मैं इस बात से असहाय महसूस कर रहा था कि मुझे कोई डर नहीं है।  सब कुछ सामान्य है यह साबित करने के लिए झूठ बोलने में मैं और अधिक असहाय महसूस कर रहा था।  मृत्युशय्या पर कुछ भी सामान्य नहीं है।  या हो सकता है, सब कुछ है।  मृत्यु किसी भी उम्र में सामान्य है, लेकिन जिस तरह से आप मरते हैं वह नहीं है।  या हो सकता है, यह है।  यह बहुत कम समय में पता लगाने के लिए बहुत सी असामान्यताओं की तरह है।  मैंने उन्हें कुछ राहत देने के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं।  उसने सहानुभूति से मेरी ओर देखा।  

वह कमरे से निकल गई।  मेरी आत्मा मुझे छोड़ने लगी।  मैं फिर से असहाय महसूस करने लगा।  जाते समय, मेरी आत्मा मेरे कान में बस फुसफुसाई, "तुम डॉक्टर से झूठ मत बोलो। अगर तुम करते हो, तो तुम मर जाते हो।"  

तुम्हारी आत्मा सब कुछ जानती है।  मेरी आत्मा मेरे सबसे बड़े डर को जानती थी।  यह था, "अगर वह चली गई, तो मैं मर जाऊंगी” 

 वह मेरा प्यार नहीं था।  वह मेरी आशा थी।  कभी-कभी उम्मीद प्यार से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है।  जीने के लिए, और जीवित रहने के लिए।  और कभी-कभी, बस जिंदा रहने के लिए।

.
.
.
.
.
.

Writing ✍️ By : Saurav Meena ( Nicki - Hazel )


Links:

Instagram : https://instagram.com/_mute_love?utm_medium=copy_link

Monday, 6 December 2021

मैं अस्पताल का मुर्दाघर हूँ !

अगर मैं अस्पताल का एक बिस्तर होता , 
और रोज़ देखता सैकड़ों आँखें , 
अपनों को दुःख में देख कर नम होती आँखें , 
कमरे के बाहर छुप कर रोती आँखें , 
दो जोड़ी नज़रों से , 
खुद को चुरा कर आँसू पोंछती आँखें , 
किसी अपने के गुज़र जाने पर पत्थर होती आँखें । 


मैं सोचता ज़रूर , 
कि निर्जीव होना बेहतर है , 
कुछ ना महसूस करना बेहतर है । 

बेहतर है एक ही जगह पड़े रहना , 
बेहतर है बदहवास लोगों का , 
होश आने तक मुझसे लिपटे रहना । 

और फिर ज़िंदगी या मौत किसी का दामन ढूंढ कर , 
मुझसे दूर चले जाना । 

बेहतर मेरा एक ही कमरे में पड़े रहना भी है , 
मेरी ना भटकने की चाह सबूत है इस बात का , 
कि निर्जीव वस्तुओं को सुकून की तलाश नहीं होती । 

वो कभी बोर नहीं होते , 
उन्हें किसी से आस नहीं होती । 

मगर मैं वो बिस्तर नहीं हूँ , 
मैं अस्पताल का मुर्दाघर हूँ , 
जिसने देखा है उन तमाम जाने वालों को , 
पीछे छूट जाने वालों के लिये आँसू बहाते , 
शांत चेहरे से हर भाव छुपाते , 
उस बिस्तर को याद करते , 
सुकून की तलाश में भटकते ।


मैंने देखी है उनकी जीवित आत्मा , 
उनकी ज़िंदगी को वापस पा लेने की चाह , 
ढूँढ़ते हुए उनका अस्तित्व , 
बीते वक़्त के लिए उनकी निकली हुई आह , 
मैंने देखा है मृत्यु का सत्य , 
और जीवन का अर्ध सत्य , 
मैंने देखा है उन निर्जीवों को , 
सजीवों से ज़्यादा महसूस करते ।
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.

Writing ✍️ By : Saurav Meena ( Nicki - Hazel )


Links:

Instagram : https://instagram.com/_mute_love?utm_medium=copy_link

"You Don't Lie To The Doctor. If You Do , You Die."

She asked me, "What has been your biggest fear throughout your life?" I sat there. Quietly. Normally, your silence hits others, bu...