और रोज़ देखता सैकड़ों आँखें ,
अपनों को दुःख में देख कर नम होती आँखें ,
कमरे के बाहर छुप कर रोती आँखें ,
दो जोड़ी नज़रों से ,
खुद को चुरा कर आँसू पोंछती आँखें ,
किसी अपने के गुज़र जाने पर पत्थर होती आँखें ।
मैं सोचता ज़रूर ,
कि निर्जीव होना बेहतर है ,
कुछ ना महसूस करना बेहतर है ।
बेहतर है एक ही जगह पड़े रहना ,
बेहतर है बदहवास लोगों का ,
होश आने तक मुझसे लिपटे रहना ।
और फिर ज़िंदगी या मौत किसी का दामन ढूंढ कर ,
मुझसे दूर चले जाना ।
बेहतर मेरा एक ही कमरे में पड़े रहना भी है ,
मेरी ना भटकने की चाह सबूत है इस बात का ,
कि निर्जीव वस्तुओं को सुकून की तलाश नहीं होती ।
वो कभी बोर नहीं होते ,
उन्हें किसी से आस नहीं होती ।
मगर मैं वो बिस्तर नहीं हूँ ,
मैं अस्पताल का मुर्दाघर हूँ ,
जिसने देखा है उन तमाम जाने वालों को ,
पीछे छूट जाने वालों के लिये आँसू बहाते ,
शांत चेहरे से हर भाव छुपाते ,
उस बिस्तर को याद करते ,
सुकून की तलाश में भटकते ।
मैंने देखी है उनकी जीवित आत्मा ,
उनकी ज़िंदगी को वापस पा लेने की चाह ,
ढूँढ़ते हुए उनका अस्तित्व ,
बीते वक़्त के लिए उनकी निकली हुई आह ,
मैंने देखा है मृत्यु का सत्य ,
और जीवन का अर्ध सत्य ,
मैंने देखा है उन निर्जीवों को ,
सजीवों से ज़्यादा महसूस करते ।
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Writing ✍️ By : Saurav Meena ( Nicki - Hazel )
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Right .......������������������
ReplyDeleteOf course ..😊
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